अर्धसैनिक बल के साए में बंगाल के दो सांसदों पर घातक हमले

बंगाल इन दिनों अन्तर्राष्ट्रीय क्षितिज पर छाया हुआ। वहां की सरकार को हटाने केंद्र की सत्तारुढ़ सरकार ने जिस तरह का अभियान चलाया चुनाव आयोग से लेकर अदना कर्मचारियों को अपने साथ लिया, हिंदुत्व का हंगामा खड़ा किया वह किसी से छुपा नहीं है। सिलसिलेवार तरीके से सब कुछ सामने आता जा रहा है। किंतु क्या फर्क पड़ता है सरकार तो बन ही गई।

पहली चुप्पी ईदुल अज़हा के पूर्व मुसलमानों ने तोड़ी उन्होंने गौवंश की कुर्बानी ना करने का फैसला लिया साथ ही गाय को राष्ट्रीय पशु का दर्जा देने की मांग की। जिससे संघ और हिंदुत्ववादी पार्टी भाजपा के होश उड़ गए। इस घटना से बौखलाई भाजपा ने कथित रूप से बांग्लादेश से आए लोगों पर शिकंजा कसा। घुसपैठ रोकने के पुख़्ता इंतजाम का काम शुरू कर दिया।इसकी जांच से ये उजागर हो रहा है वे तो भारत की शरणार्थी नीति के तहत बंगाल में चले आए थे।

उनमें से कुछ लोगों ने यहां की नागरिकता भी ले ली जिनमें मुख्यमंत्री शुभेंदु भी शामिल हैं। भाजपा के आतंक का परिणाम ये है कि नागरिकता विहीन काम करने आए शरणार्थियों के साथ नागरिकता लेने वाले बांग्लादेशी लोग भी वापस जा रहे हैं। क्योंकि उनके साथ जो बर्ताव हो रहा है वह अमानवीय है। बहरहाल उनके जाने का असर बांग्लादेश में रह रहे प्रवासियों पर भी पड़ेगा और हमारे पड़ोसी देश से सम्बंध नाज़ुक रहेंगे।

बहरहाल, लगातार विवादों में घिरी भाजपा के अपने काम अलग हैं, अलग अलग कानून हैं। अब वह विपक्ष को चुप करने की कोशिश में रत है, पिछले दिनों यह देखा गया कि भाजपा ने तृणमूल कांग्रेस के सांसद अभिषेक बनर्जी और कल्याण बनर्जी जो जनता की आवाज़ उठा रहे थे, उन पर जिस तरह अर्धसैनिक बलों की उपस्थिति में हमले करवाए। उसके फुटेज़ दिल दहलाने वाले हैं। लगता है अर्धसैनिक बल को दिखावे या यूं कहें विपक्ष के लोगों को कुचलने यहां 60 दिनों के लिए रखा गया है।

याद आता है गुजरात में अपनी जड़ें मज़बूत करने के लिए वहां के कांग्रेस के कार्यकर्ताओं और नेताओं को ऐसा ही दबाव बनाकर नेस्तनाबूद किया गया था। वैसे ही हथकंडे यहां के विपक्ष को साथ लेने साम, दंड, और भेद की रणनीति अर्धसैनिक बलों के साए में जारी है।

अफ़सोस इस बात का है कि भाजपाई आततायियों के हमले को तृणमूल कार्यकर्ताओं का विरोध बताया जा रहा है जबकि फुटेज़ में सब साफ़ दिखाई दे रहा है। यह तानाशाही रवैया ही है कि घायलों के अस्पतालों के दरवाज़े बंद कराए गए। भाजपा महिला कार्यकर्ता भी इस हमले में शामिल रहीं यह चिंता जनक है। मंत्रिमंडल विस्तार करीब है कहीं ऐसा तो नहीं कि ये नेता-नेत्री इस काम का इनाम पाने की चेष्टा कर रहे हैं। क्योंकि भाजपा में बहुतायत में ऐसे अपराधी दमखम वाले नेताओं को महाबली बनाने का क्रम निरंतर चल रहा है।

यहां, नैतिकता और स्वाभिमान बिकाऊ होने के साथ विपक्ष पर हमलावर होने की ताकत नेतृत्वकर्ता के लिए अनिवार्य होती जा रही है।इसके उदाहरण मुख्यमंत्री हैं। जिन्हें सब जानते हैं।

कुल मिलाकर भाजपा का चाल, चरित्र और चेहरा दोगले पन का शिकार है। कथनी करनी में फर्क है। संविधान और प्रजातंत्र के न्याय को भी कटघरे में खड़ा कर दिया गया है।

(सुसंस्कृति परिहार एक्टिविस्ट और टिप्पणीकार हैं।)

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